ग्रह, ग्रह है या देवता?
ग्रह, ग्रह है या देवता?
प्रकाशयुक्त अंतरिक्ष पिंड को नक्षत्र कहा जाता है। हमारा सूर्य भी एक नक्षत्र है। ये नक्षत्र कोई चेतन प्राणी नहीं हैं, जो किसी व्यक्ति विशेष पर प्रसन्न या क्रोधित होते हों। कालांतर में प्रत्येक ग्रह का एक देवता नियुक्त कैसे हो गया, यह शोध का विषय है। कुछ लोग कहते हैं कि जब हमारे ऋषियों के समक्ष ग्रहों की चाल, दशा और दिशा बताने का कोई ठोस उपाय नहीं था तब उन्होंने इस संपूर्ण घटनाक्रम को एक कथा में पिरोया। अब किसी देवता की कहानी को ग्रह की कहानी से निकालकर देखना और किसी ग्रह की कहानी को देवता की कहानी से निकालकर देखना जरूरी है। ऋषियों ने तारामंडल के इस संपूर्ण डाटा को संरक्षित रखने के लिए प्रत्येक ग्रह का एक देवता नियुक्त कर उस आधार पर पंचांग, कैलेंडर आदि बनाए और ग्रहों की चाल को बताने के लिए कथा का भी सृजन किया।
निश्चित ही देवता और ग्रह दोनों अलग-अलग हैं। जो देवता जिस ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है या जिस देवता का चरित्र जिस ग्रह के समान है या यह कहें कि ग्रहों की प्रकृति को दर्शाने के लिए उसकी प्रकृति अनुसार ग्रहों के नाम उक्त देवताओं पर रखे गए, जो उस प्रकृति के हैं तो उचित रहेगा। राहु और केतु एक दानव थे जिन्होंने अमृत मंथन के समय चोरी से अमृत का स्वाद चख लिया था। सभी ग्रहों की छाया को राहु और केतु की छाया माना जाता है। इस छाया का भी धरती पर प्रभाव पड़ता है। कुछ ज्योतिषाचार्य कहते हैं कि यह दक्षिणी और उत्तरी ध्रुव का प्रतीक है। ज्योतिष के अनुसार केतु और राहु आकाशीय परिधि में चलने वाले चन्द्रमा और सूर्य के मार्ग के प्रतिच्छेदन बिंदु को निरूपित करते हैं इसलिए राहु और केतु को क्रमश: उत्तर और दक्षिण चन्द्र आसंधि कहा जाता है। यह तथ्य कि ग्रहण तब होता है, जब सूर्य और चन्द्रमा इनमें से एक बिंदु पर होते हैं।
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