कार्तवीर्यार्जुन स्तोत्र अत्यंत लघु है किंतु अत्यधिक प्रभावशाली है



कार्तवीर्यार्जुन  स्तोत्र अत्यंत लघु है 

   किंतु अत्यधिक प्रभावशाली  है 

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कार्तवीर्यार्जुन  स्तोत्र अत्यंत लघु है किंतु अत्यधिक प्रभावशाली  है इसके नित्य पाठ से धन की हानि नहीं होती कोई भी आपका धन हरण नहीं कर सकता यदि कोई आपका कुछ सामान कहीं पा भी जाता है तो वह वापस कर देगा यदि कहीं धन फंसा है तो इसके प्रयोग से शीघ्र ही मिल जाता है  कार्तवीर्यार्जुन  स्तोत्र अत्यंत लाभदायक सिद्ध हुआ है चोरी हुए धन खोए हुए परिजन की प्राप्ति के लिए यह रामबाण की तरह काम करता है इस पाठ की विधि इस प्रकार से हैं लाल वस्त्र धारण करके पवित्र स्थल में लाल आसन पर बैठ कर के अपने सामने  चौमुखा दीपक बना ले दीपक में तिल का तेल भरकर के चतुर्मुखी दीपक को जला दें दीपक का पूजन करें पवित्र आचमन संकल्प करके 108 बार कार्तवीर्यार्जुन मंत्र का जप करें उसके पश्चात इस  स्तोत्र का पाठ करें इस प्रकार प्रत्यक्ष संकल्पित कार्य सिद्ध  होता दिखाई देगा 54 दिन में यह प्रयोग पूर्ण होता है कार्तवीर्यार्जुन का पाठ नित्य 15 11 अथवा 21 पाठ करने से कार्य सिद्ध होता है अनुष्ठान रूप में क्रमानुसार सहसरा युद्ध अथवा लक्ष्य संख्या का पाठ आत्मक प्रयोग किया जा सकता है ब्रह्मचारी पूर्वक जिस स्थान पर प्रयोग करें उसी स्थान का 54 दिन तक प्रयोग करना चाहिए

विनियोग   

श्री कार्तवीर्यार्जुन  स्तोत्रस्य दत्तात्रेय ऋषिः अनुष्टुप छंदः श्री कार्तवीर्यार्जुन देवता फ्रों बीजं ह्रीं शक्तिः क्लीं कीलकं मम अभीष्ट कार्य सिद्धार्थे पाठे विनियोगः

ध्यान

 सहस्त्रबाहुं ससरं सचापं रक्तांबरं रक्तकिरीट कुंडलम्
 चौरादि दुष्टनासनमिष्टदं तं ध्यायेन्महाबल विजृम्भित
कार्तिवीर्यम्
कार्तवीर्यार्जुनॊनाम राजाबाहुसहस्रवान्। तस्यस्मरण मात्रॆण गतम् नष्टम् च लभ्यतॆ॥ कार्तवीर्यह:खलद्वॆशीकृत वीर्यॊसुतॊबली। सहस्र बाहु:शत्रुघ्नॊ रक्तवास धनुर्धर:॥ रक्तगन्थॊ रक्तमाल्यॊ राजास्मर्तुरभीष्ट:। द्वादशैतानि नामानि कातवीर्यस्य य: पठॆत्॥ सम्पदस्तत्र जायन्तॆ जनस्तत्रवशन्गत:। आनयत्याशु दूर्स्थम् क्षॆम लाभयुतम् प्रियम्॥ सहस्रबाहुम् महितम् सशरम् सचापम्। रक्ताम्बरम् विविध रक्तकिरीट भूषम् चॊरादि दुष्ट भयनाशन मिष्दटम् ध्यायॆनामहाबलविजृम्भित कार्तवीर्यम्॥
यस्य स्मरण मात्रॆण सर्वदु:खक्षयॊ भवॆत्। यन्नामानि महावीरस्चार्जुनह:कृतवीर्यवान्॥ हैहयाधिपतॆ: स्तॊत्रम् सहस्रावृत्तिकारितम्। वाचितार्थप्रदम् नृणम् स्वराज्यम् सुक्रुतम् यदि॥ ॥
इति कार्तवीर्यार्जुन द्वादश नामस्तॊत्रम् सम्पूर्णम्॥

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