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Shiv manas puja शिव मानस पूजा स्तोत्र से करें शिव की आराधना, जीवन में कभी नहीं सताएगी धन की चिंता

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शिव मानस पूजा:स्तोत्र से करें शिव की आराधना, जीवन में कभी नहीं सताएगी धन की चिंता, शिव मानस पूजा के पाठ का लाभ ; शिव मानस पूजा  भगवान भोलेनाथ की अद्भुत स्तुति है। सावन में शिव मानस पूजा स्तोत्र से शिव की आराधना भक्ति दैहिक और भौतिक कष्टों से शीघ्र मुक्ति दिलाता है। शिव मानस पूजा भगवान भोलेनाथ की अद्भुत स्तुति है। सावन में शिव मानस पूजा स्तोत्र से शिव की आराधना भक्ति दैहिक और भौतिक कष्टों से शीघ्र मुक्ति दिलाता है। कहते हैं कि जो शिव भक्त सावन के पवित्र महीने में प्रत्येक दिन अथवा सोमवार को शिव को इस स्तुति से जल अर्पित करता है, उससे समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं। पुराणों में भी शिव के इस स्तोत्र का वर्णन मिलता है। शिव मानस पूजा स्तोत्र में कुल मिलाकर 5 श्लोक है। मान्यता है कि इस स्तोत्र से शिव की आराधना करने से भक्त की हर मनोकामना पूरी होती है।  शिव मानस पूजा की रचना स्वयं शंकराचार्य ने  शिव की स्तुति के लिए की थी!!! शिव मानस पूजा स्तोत्र रत्नैः कल्पितमा‌‌सनँ हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं। नाना रत्न विभूषितम्‌ मृग मदामोदांकितम्‌ चंदनम॥ जाती चम्पक बिल्वपत्र रचितं पुष्पं च ...

क्‍या है गंडमूल नक्षत्र?

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क्‍या है गंडमूल नक्षत्र? शास्त्रों में कुल 27 नक्षत्रों का उल्लेख किया गया है। इनमें से कुछ नक्षत्र शुभ होते हैं तो वहीं कुछ नक्षत्र अशुभ माने जाते हैं। इन अशुभ नक्षत्रों को ही गंडमूल नक्षत्र कहा जाता है। गंडमूल नक्षत्रों की श्रेणी में अश्विनी, अश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल और रेवती आते हैं। अशुभ नक्षत्र अपना बुरा प्रभाव दिखाते हैं और शुभ नक्षत्र शुभ। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार गंडमूल नक्षत्र में जन्म लेना अशुभ माना गया है। गंडमूल नक्षत्र में व्यक्ति के जन्म लेने पर नकारात्मक फलकारक स्थिति उत्‍पन्‍न होती है जिसमें समय की विभिन्नता के आधार पर अशुभ फल भिन्न-भिन्न प्रकार से मिलता है प्रभावित जातक गंडमूल नक्षत्र में जन्मे जातक ना सिर्फ अपने लिए बल्कि अपने परिवार के लिए भी परेशानी बन जाते हैं। लेकिन ध्यान रहे इस नक्षत्र के शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के प्रभाव पड़ते हैं। अशुभ फल में जातक का जीवन परेशानियों में उलझा रहता है। ये जातक अपने पिता के लिए कष्टकारी होते हैं। इसके विपरीत शुभ फल होने पर जातक को उच्च पद प्राप्त होने के अवसर प्राप्त होते हैं। उसे अपने मित्रों से लाभ प्राप्त होता है। उसकी रूच...

निर्जला एकादशी 2 जून 2020 को, जानें क्या करें और क्या नहीं 👉🏻इस एकादशी का व्रत से साल की समस्त एकादशी के व्रत का फल प्राप्त होता है...

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निर्जला एकादशी 2 जून 2020 को, जानें क्या करें और क्या नहीं? कैप्शन जोड़ें   इस एकादशी का व्रत से साल की समस्त एकादशी के व्रत का फल प्राप्त होता है.. निर्जला एकादशी पर क्या करें और क्या नहीं साल में सामान्यत: चौबीस एकादशी आती हैं, वहीं अधिकमास होने पर इनकी संख्या 26 तक पहुंच जाती है। इन एकादशियों में निर्जला एकादशी को सबसे श्रेष्ठ माना गया है। वहीं इस साल यानि 2020 में ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी 2 जून, मंगलवार को मनाई जाएगी। इस निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी भी कहते हैं, क्योंकि महर्षि वेदव्यास के अनुसार भीमसेन ने इसे धारण किया था। मान्यता है कि इस एकादशी का व्रत रखने से ही साल में आने वाली समस्त एकादशी के व्रत का फल प्राप्त होता है। इस व्रत में सूर्योदय से द्वादशी के सूर्योदय तक जल तक न पीने का विधान होने के कारण इसे निर्जला एकादशी कहते हैं। इस दिन निर्जल रहकर भगवान विष्णु की आराधना का विधान है। इस व्रत से दीर्घायु और मोक्ष की प्राप्ति होती हक निर्जला एकादशी पारणा मुहूर्त :05:33:14 से 08:15:23 तक 3, जून को  निर्जला एकादशी 2020 व्रत पारण अवधि :2 घंटे 42...

ज्योतिष का धर्म से क्या संबंध है???

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ज्योतिष का धर्म से क्या संबंध है? अंधकार काल में व्यक्ति मौसम और प्रकृति से डरता था। बस इसी डर ने एक ओर ज्योतिष को जन्म दिया, तो दूसरी ओर धर्म को। जिन लोगों ने बिजली के कड़कने या गिरने को बिजली देव माना, वे धर्म को गढ़ रहे थे और जिन्होंने बिजली को बिजली ही माना, वे ज्योतिष के एक भाग खगोल विज्ञान को गढ़ रहे थे। जिज्ञासुओं में एक विज्ञान खोज रहा था, तो दूसरा धर्म। इसी तरह आगे चलकर धर्म और ज्योतिष अलग होते हुए जुड़ते गए।  ' ज्योतिषम् नेत्रमुच्यते'- इसका अर्थ होता है कि वेद को समझने के लिए, सृष्टि को समझने के लिए 'ज्योतिष शास्त्र' को जानना आवश्यक है। ज्योतिष को वेदों का नेत्र कहा गया है। कहते हैं कि ऋग्वेद में ज्योतिष से संबंधित 30 श्लोक हैं, यजुर्वेद में 44 तथा अथर्ववेद में 162 श्लोक हैं। ज्योतिष को 6 वेदांगों में शामिल किया गया है। ये 6 वेदांग हैं- 1. शिक्षा, 2. कल्प, 3. व्याकरण, 4. निरुक्त, 5. छंद और 6. ज्योतिष। *प्राचीनकाल में उचित जगह पर घर, आश्रम, मंदिर, मठ या गुरुकुल बनाने के लिए ज्योतिष विद्या की सहायता ली जाती थी, जैसे मिस्र के पिरामिड, महाकाल का मंदिर, अजंता-एलोर...

ज्योतिष का सकारात्मक पहलू ज्योतिष विज्ञान या अंध विश्वास :-

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  2➡ ज्योतिष का सकारात्मक पहलू     ज्योतिष विज्ञान या अंध विश्वास :-  ज्योतिष अद्वैत का विज्ञान है। इस विज्ञान को सही और सकारात्मक दिशा में विकसित किए जाने की आवश्यकता है। कुछ लोग कहते हैं कि ज्‍योतिष सिर्फ इतनी ही बात नहीं है कि ग्रह-नक्षत्र क्‍या कहते हैं? उनकी गणना क्‍या कहती है? यह तो सिर्फ ज्‍योतिष का एक डायमेंशन है, एक आयाम है। फिर भविष्‍य को जानने के और आयाम भी हैं। मनुष्‍य के हाथ पर खींची हुई रेखाएं हैं, मनुष्‍य के माथे पर खींची हुई रेखाएं हैं, मनुष्‍य के पैर पर खींची हुई रेखाएं हैं, पर ये भी बहुत ऊपरी हैं। मनुष्‍य के शरीर में छिपे हुए चक्र हैं। उन सब चक्रों का अलग-अलग संवेदन है। उन सब चक्रों की प्रतिपल अलग-अलग गति है। उनकी जांच है। मनुष्‍य के पास छिपा हुआ, अतीत का पूरा संस्‍कार बीज है। ज्योति का अर्थ होता है प्रकाश और ज्योतिष का अर्थ होता है ज्योति पिंडों का अध्ययन। ज्योतिष शास्त्र का अर्थ प्रकाश वाले पिंडों की गतिविधियों को बताने वाला शास्त्र। हमारे सौर मंडल में अब तक 10 से 12 ग्रह खोजे गए हैं। सभी ग्रहों के मिलाकर 64 चन्द्रमा खोजे गए हैं और असंख्‍य उल...

ग्रह, ग्रह है या देवता?

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  ग्रह, ग्रह है या देवता? प्रकाशयुक्त अंतरिक्ष पिंड को नक्षत्र कहा जाता है। हमारा सूर्य भी एक नक्षत्र है। ये नक्षत्र कोई चेतन प्राणी नहीं हैं, जो किसी व्यक्ति विशेष पर प्रसन्न या क्रोधित होते हों। कालांतर में प्रत्येक ग्रह का एक देवता नियुक्त कैसे हो गया, यह शोध का विषय है। कुछ लोग कहते हैं कि जब हमारे ऋषियों के समक्ष ग्रहों की चाल, दशा और दिशा बताने का कोई ठोस उपाय नहीं था तब उन्होंने इस संपूर्ण घटनाक्रम को एक कथा में पिरोया। अब किसी देवता की कहानी को ग्रह की कहानी से निकालकर देखना और किसी ग्रह की कहानी को देवता की कहानी से निकालकर देखना जरूरी है। ऋषियों ने तारामंडल के इस संपूर्ण डाटा को संरक्षित रखने के लिए प्रत्येक ग्रह का एक देवता नियुक्त कर उस आधार पर पंचांग, कैलेंडर आदि बनाए और ग्रहों की चाल को बताने के लिए कथा का भी सृजन किया। निश्‍चित ही देवता और ग्रह दोनों अलग-अलग हैं। जो देवता जिस ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है या जिस देवता का चरित्र जिस ग्रह के समान है या यह कहें कि ग्रहों की प्रकृति को दर्शाने के लिए उसकी प्रकृति अनुसार ग्रहों के नाम उक्त देवताओं पर रखे गए, जो उस प्रकृति ...

ग्रहों का मानव जीवन में प्रभाव

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  ग्रहों का मानव जीवन में प्रभाव :           हमारी धरती पर सूर्य का सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है, उसके बाद चन्द्रमा का प्रभाव माना गया है। उसी तरह क्रमश: मंगल, गुरु, बुद्ध और शनि का भी प्रभाव पड़ता है। ग्रहों का प्रभाव संपूर्ण धरती पर पड़ता है, किसी एक मानव पर नहीं। धरती के जिस भी क्षेत्र विशेष में जिस भी ग्रह विशेष का प्रभाव पड़ता है, उस क्षेत्र विशेष में परिवर्तन देखने को मिलते हैं। धरती के उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव का प्रभाव संपूर्ण धरती पर रहता है और पृथ्वी एक सीमा तक सभी वस्तुओं को अपनी ओर खींचती है। समुद्र में ज्वार-भाटा का आना भी सूर्य और चन्द्र की आकर्षण शक्ति का प्रभाव है। अमावस्या और पूर्णिमा का भी हमारी धरती पर प्रभाव पड़ता है। जब हम 'प्रभाव पड़ने' की बात करते हैं, तो इसका मतलब यह कि एक जड़ वस्तु चाहे वह चन्द्रमा हो, उसका प्रभाव दूसरी जड़ वस्तु चाहे वह समुद्र का जल हो या हमारे पेट का जल, पर पड़ता है। लेकिन हमारे मन और विचारों को हम नियंत्रण में रख सकते हैं। मन को नियंत्रण में रखने से भविष्य भी नियंत्रित हो जाता है। जिस तरह चन्द्रमा के कारण धरती के स...